कोटा रेलवे अस्पताल खुद पड़ा 'बीमार': वर्षों पुराने कंप्यूटरों और स्टाफ की कमी से चरमराई व्यवस्था, मरीज बेहाल

कोटा रेलवे अस्पताल खुद पड़ा 'बीमार': वर्षों पुराने कंप्यूटरों और स्टाफ की कमी से चरमराई व्यवस्था, मरीज बेहाल

कोटा। कोटा मंडल रेल चिकित्सालय इन दिनों स्वयं उपचार की बाट जोह रहा है। अस्पताल की ऑनलाइन प्रणाली पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है, जिसके कारण रजिस्ट्रेशन से लेकर दवा वितरण और रेफरल सेवाओं तक के लिए मरीजों को भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। सबसे गंभीर स्थिति पैथोलॉजी लैब की है, जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टर की अनुपस्थिति में पूरी व्यवस्था टेक्नीशियनों के भरोसे चल रही है।

तकनीकी संकट: कछुआ चाल चल रहे सिस्टम

अस्पताल में लगे कंप्यूटर इतने पुराने हो चुके हैं कि वे बार-बार हैंग हो जाते हैं। इसका सीधा असर मरीजों की सेवाओं पर पड़ रहा है:

  • लंबी कतारें: रजिस्ट्रेशन और दवा वितरण काउंटर पर सिस्टम धीमा होने से मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है।

  • रेफरल में देरी: गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल रेफर करने के लिए जरूरी 'रेफरल लेटर' समय पर प्रिंट नहीं हो पाते, जिससे इलाज में देरी और आर्थिक नुकसान हो रहा है।

  • डॉक्टरों पर आक्रोश: तकनीकी खामियों का खामियाजा डॉक्टरों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि देरी से परेशान मरीजों का गुस्सा अक्सर उन पर निकलता है।

अनुभवहीन हाथों में जिम्मेदारी: सुरक्षा पर सवाल

नियमित कर्मचारियों की कमी के कारण रजिस्ट्रेशन और डेटा एंट्री जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में अप्रेंटिस को लगाया गया है।

  • गलत एंट्री का डर: चिकित्सा सॉफ्टवेयर की पर्याप्त जानकारी न होने के कारण विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं की गलत एंट्री होने की आशंका बनी रहती है, जो मरीजों की जान के लिए खतरा साबित हो सकती है।

पैथोलॉजी लैब की बदहाली: न डॉक्टर, न सही समय

लैब की कार्यप्रणाली मरीजों के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है:

  1. देरी से सैंपलिंग: लैब स्टाफ सुबह 8:45 से पहले सैंपल नहीं लेते। शुगर और अन्य जांचों के लिए खाली पेट आए गंभीर मरीज घंटों भूखे रहने को मजबूर हैं।

  2. भटकाव: सुबह आउटडोर और 11 बजे के बाद इंडोर वार्ड में सैंपल लिए जाते हैं। दो अलग-अलग जगहों के चक्कर में मरीज परेशान रहते हैं।

  3. विशेषज्ञ का अभाव: अस्पताल में कोई पैथोलॉजिकल डॉक्टर तैनात नहीं है। जांच रिपोर्ट की गुणवत्ता पूरी तरह टेक्नीशियनों पर टिकी है, जिससे सटीक डायग्नोसिस पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

प्रशासन का पक्ष: गोलमोल जवाब

जब इस अव्यवस्था के संबंध में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) सुपर्णा रायसेन से सवाल किया गया, तो उन्होंने किसी ठोस योजना की जानकारी देने के बजाय केवल "व्यवस्था में सुधार होगा" कहकर पल्ला झाड़ लिया।

निष्कर्ष: यदि तकनीकी उपकरणों को तुरंत अपग्रेड नहीं किया गया और रिक्त पदों पर विशेषज्ञ स्टाफ नहीं लगाया गया, तो कोटा का यह प्रमुख रेलवे अस्पताल केवल रेफरल केंद्र बनकर रह जाएगा।


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