जयपुर।
राजस्थान पुलिस महकमे के प्रशासनिक कामकाज, रोजमर्रा की पुलिसिंग और कानूनी दस्तावेजों को लेकर राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय (PHQ) ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक नीतिगत निर्णय लिया है। प्रदेश में अब पुलिस विभाग से जुड़े किसी भी प्रकार के आधिकारिक कामकाज, कागजातों, एफआईआर (FIR), केस डायरियों और पत्राचार में 'दलित' शब्द का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित (बैन) कर दिया गया है।
कार्यालय अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (विविध प्रकोष्ठ एवं एससी/एसटी) राजस्थान के निर्देशानुसार, पुलिस अधीक्षक ज्ञानचन्द्र यादव द्वारा इस संबंध में एक बेहद सख्त और विस्तृत सर्कुलर जारी किया गया है।
पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी इस आदेश पत्र में स्पष्ट रूप से पुराने कानूनी फैसलों और विधिक कड़ियों का हवाला दिया गया है:
मंत्रालय के पुराने निर्देश: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा 15 मार्च 2015 को जारी किए गए मूल पत्र की निरंतर पालना में यह कदम उठाया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश: माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पुराने दिशा-निर्देशों और गृह ग्रुप-13 विभाग, राजस्थान शासन सचिवालय के पत्रों के संदर्भ में इस व्यवस्था को मरुधरा में और अधिक कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता जताई गई थी।
पुलिस अधीक्षक ज्ञानचन्द्र यादव द्वारा 2 जुलाई 2026 को जारी पत्र के अनुसार, यह भाषाई बदलाव केवल साधारण पत्राचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पुलिस के पूरे डिजिटल और मैनुअल रिकॉर्ड को अपडेट किया जाएगा:
संवैधानिक शब्दावली अनिवार्य: अब अनुसूचित जाति के संदर्भों को दर्शाने के लिए सभी प्रकार के विभागीय अभिलेखों, थानों के दैनिक फॉर्म-नंबरों, मानपत्रों और व्यावसायिक प्रमाण पत्रों में केवल संवैधानिक शब्दों का प्रयोग होगा।
लिखित और मौखिक नियम: लिखित दस्तावेजों और मौखिक संवाद दोनों में हिंदी भाषा के लिए 'अनुसूचित जाति' और अंग्रेजी भाषा के लिए 'Scheduled Caste' शब्द का ही प्रयोग अनिवार्य किया गया है। अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी इसका केवल उपयुक्त और सटीक कानूनी अनुवाद ही उपयोग में लाया जा सकेगा।
इस नीतिगत आदेश की कड़ाई से पालना सुनिश्चित कराने के लिए राजस्थान पुलिस की तमाम फील्ड कमानों को तुरंत वायरलेस और लिखित निर्देश तामील करवा दिए गए हैं:
समस्त महानिदेशक पुलिस (रेल, राज्य), पुलिस आयुक्त (जयपुर व जोधपुर) के साथ-साथ राज्य के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस उपायुक्तों (DCP) को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में इसे शत-प्रतिशत लागू कराने को कहा गया है।
आदेश के तुरंत बाद कार्यालय पुलिस उपायुक्त (उत्तर) जयपुर ने भी एक्शन लेते हुए अपने क्षेत्र के सभी अतिरिक्त पुलिस उपायुक्तों, सहायक पुलिस आयुक्तों (ACP) और समस्त थानाधिकारियों (उत्तर जयपुर) को मैदानी स्तर पर इसकी तुरंत पालना शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं।
प्रशासनिक और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीतिगत फैसले का समाज और थानों के भीतर गहरा और सकारात्मक मानवीय असर देखने को मिलेगा:
विधिक शुद्धता और शालीनता: थानों में दर्ज होने वाले मुकदमों, केस डायरियों और आधिकारिक जांच रिपोर्टों में अब किसी भी व्यक्ति की वर्ग विशेष की पहचान को संबोधित करते समय केवल गैर-विवादास्पद, विधिक और संवैधानिक शब्दों का ही सहारा लिया जाएगा। इससे रोजमर्रा के संवाद में अधिक शालीनता और संवेदनशीलता आएगी।
मानवीय गरिमा का सम्मान: यह भाषाई सुधार सीधे तौर पर व्यक्ति की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है। इससे सरकारी व्यवस्था और पुलिसिया तंत्र के प्रति आम नागरिकों (विशेषकर वंचित वर्गों) का सम्मान और विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा।
#RajasthanPolice #DalitWordBan #RajasthanHomeDepartment #SPGyanChandraYadav #ScheduledCaste #ConstitutionalTerminology #RajasthanBureaucracy #JaipurPoliceCommissionerate #BreakingNews
No comments yet. Be the first to comment!
Please Login to comment.
© G News Portal. All Rights Reserved.